[309+] Sant Kabir Ke Dohe In Hindi Meaning 2020 | कबीर के दोहे

309+ Sant Kabir Ke Dohe: अगर आप संत कबीर दास जी के दोहे kabir ke dohe के बारे में पढ़ने अथवा उनके अर्थ जानने के लिए इक्छुक हैं, तो आप एकदम सही पेज पर पहुंचें हैं. यहां हम आपको 309+ से ज्यादा Kabir Ke Dohe अर्थ सहित दोहे देने का प्रयास किया हैं।

हमें उम्मीद हैं की आपको ये हमारा पोस्ट अवश्य ही पसंद आएगा, हम आपको Kabir Ke Dohe से पहले कबीर जी के बारे में छोटी जानकारी देना चाहेंगे।

कबीर दास का जीवन काफी कठिनाइयों से भरा हुआ था लेकिन फिर भी उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने के लिए जीवन के अंतिम दिनों तक प्रयत्न किया।

संत कबीर दास जी समाज में फैले आडंबर और अंधविश्वास को मिटाने के लिए दोहे और पद की रचना करते थे जिनका सीधा उद्देश्य कुरीतियों पर वार करना था।

कबीर जी के दोहे और साथिया आज के युग में भी समान तरीके से लाभदायक है। क्योंकि आज भी समाज में बहुत से आडंबर और अंधविश्वास फैले हैं जिन्हें मिटाना बहुत जरूरी है।

आपको हमारे इस आर्टिकल में ना सिर्फ कबीर के दोहे और साखियां पढ़ने को मिलेंगे बल्कि उनकी संपूर्ण व्याख्या भी प्राप्त होगी। और Kabir Ke Dohe के बाद हम आपको इस पोस्ट के अंत में कबीर जी के जीवनी के बारे में छोटा प्रकाश भी डालने की कोशिस की हैं।

तो चलिए शुरू करते है,- संत कबीर दास के दोहे हिंदी में Kabir Ke Dohe With Meaning In Hindi.

Famous Sant Kabir Ke Dohe In Hindi Meaning – कबीर के दोहे और अर्थ

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ बहुत बड़ा होता है लेकिन ना तो वो किसी को छाया देता है और फल भी बहुत दूरऊँचाई पे लगता है। इसी तरह अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे तो ऐसे बड़े होने से भी कोई फायदा नहीं है।

Sant Kabir Ke Dohe With Hindi Meaning
[309+] Sant Kabir Ke Dohe In Hindi Meaning 2020 | कबीर के दोहे 4

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप। जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जहाँ दया है वहीँ धर्म है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ ईश्वर का वास होता है।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।

अर्थ: दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में सब ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं।

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि लोग बड़ी से बड़ी पढाई करते हैं लेकिन कोई पढ़कर पंडित या विद्वान नहीं बन पाता। जो इंसान प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ लेता है वही सबसे विद्वान् है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि किताबें पढ़ पढ़ कर लोग शिक्षा तो हासिल कर लेते हैं लेकिन कोई ज्ञानी नहीं हो पाता। जो व्यक्ति प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ ले और वही सबसे बड़ा ज्ञानी है, वही सबसे बड़ा पंडित है।

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए। यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए।

अर्थ: अगर आपका मन शीतल है तो दुनियां में कोई आपका दुश्मन नहीं बन सकता

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आप कितना भी नहा धो लीजिए, लेकिन अगर मन साफ़ नहीं हुआ तो उसे नहाने का क्या फायदा, जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन फिर भी वो साफ़ नहीं होती, मछली में तेज बदबू आती है।

अवगुण कहू शराब का, आपा अहमक होय। मानुष से पशुआ भय, दाम गाँठ से खोये।

अर्थ: शराब लेने पर एक व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है। वह जानवर बन जाता है. और अपने पैसे खर्च करता है।

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे। दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रावे।

अर्थ: दुनिया बहुत खुश है, वे खाते हैं और सोते हैं। कबीर इतना दुखी है कि वह जागता रहता है और रोता रहता है।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हमारे पास समय बहुत कम है, जो काम कल करना है वो आज करो, और जो आज करना है वो अभी करो, क्यूंकि पलभर में प्रलय जो जाएगी फिर आप अपने काम कब करेंगे।

Sant Kabir Das Ji – Overview

NameKabir Das / कबीर दास (kabir ke dohe)
Born1398 or 1440 (Not Confirmed), Varanasi, India
Died1448 or 1518 (Not Confirmed), Maghar, India
OccupationPoetry, Mysticism, Atheism, Syncretism, Devotee, Cotton Spinning Cloth
NationalityIndian

लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट। अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार ज्ञान से भरा पड़ा है, हर जगह राम बसे हैं। अभी समय है राम की भक्ति करो, नहीं तो जब अंत समय आएगा तो पछताना पड़ेगा।

ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।

अर्थ: मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो।

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत। अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि बीता समय निकल गया, आपने ना ही कोई परोपकार किया और नाही ईश्वर का ध्यान किया। अब पछताने से क्या होता है, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार। सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।

अर्थ: तीर्थ करने से एक पुण्य मिलता है, लेकिन संतो की संगति से पुण्य मिलते हैं। और सच्चे गुरु के पा लेने से जीवन में अनेक पुण्य मिल जाते हैं

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है। मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ भावार्थात हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं लेकिन अगर आप खुद के अंदर झाँक कर देखें तो पाएंगे कि हमसे बुरा कोई इंसान नहीं है।

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।

अर्थ: साधु से उसकी जाति मत पूछो बल्कि उनसे ज्ञान की बातें करिये, उनसे ज्ञान लीजिए। मोल करना है तो तलवार का करो म्यान को पड़ी रहने दो।

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान। जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण।

अर्थ: जिस इंसान अंदर दूसरों के प्रति प्रेम की भावना नहीं है वो इंसान पशु के समान है।

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ: इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो ।

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ: इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता।

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये। मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हे प्रभु मुझे ज्यादा धन और संपत्ति नहीं चाहिए, मुझे केवल इतना चाहिए जिसमें मेरा परिवार अच्छे से खा सके। मैं भी भूखा ना रहूं और मेरे घर से कोई भूखा ना जाये।

पांच पहर धंधा किया, तीन पहर गया सोय। एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।

अर्थ: मैंने दिन के दौरान अपनी आजीविका कमाने के लिए कुछ किया और रात में सो गया। मैंने 3 घंटे के लिए भी भगवान के नाम का जप नहीं किया, मैं कैसे मोक्ष प्राप्त कर सकता हूं?

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह। राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय।

अर्थ: एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सबसे बिछुड़ना पडेगा। हे राजाओं ! हे छत्रपतियों ! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ: न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई। कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई।

अर्थ: मूर्ख का साथ मत करो। मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है। संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है।

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय। अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय।

अर्थ: एक पेड़ से एक पत्ता कहता है कि वह हमेशा के लिए दूर जा रहा है और अब कोई पुनर्मिलन नहीं होगा।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ: सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का उसे ढकने वाले खोल का।

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि। कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि।

अर्थ: अहंकार बहुत बुरी वस्तु है। हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ। मित्र, रूई में लिपटी इस अग्नि. अहंकार को मैं कब तक अपने पास रखूँ?

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय। कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि चन्द्रमा भी उतना शीतल नहीं है और हिमबर्फ भी उतना शीतल नहीं होती जितना शीतल सज्जन पुरुष हैं। सज्जन पुरुष मन से शीतल और सभी से स्नेह करने वाले होते हैं।

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोई सुरमा, जाती बरन कुल खोए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि कामी, क्रोधी और लालची, ऐसे व्यक्तियों से भक्ति नहीं हो पाती। भक्ति तो कोई सूरमा ही कर सकता है जो अपनी जाति, कुल, अहंकार सबका त्याग कर देता है।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त, अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ: यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय।

अर्थ: ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ: इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि एक सज्जन पुरुष में सूप जैसा गुण होना चाहिए। जैसे सूप में अनाज के दानों को अलग कर दिया जाता है वैसे ही सज्जन पुरुष को अनावश्यक चीज़ों को छोड़कर केवल अच्छी बातें ही ग्रहण करनी चाहिए।

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये। ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम पैदा हुए थे उस समय सारी दुनिया खुश थी और हम रो रहे थे। जीवन में कुछ ऐसा काम करके जाओ कि जब हम मरें तो दुनियां रोये और हम हँसे।

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।

अर्थ: कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए।

रिद्धि सिद्धि मांगूं नहीं, माँगू तुम पी यह। निशिदिन दर्शन साधू को, प्रभु कबीर कहू देह।

अर्थ: कबीर भगवान से भौतिक संपदा के लिए नहीं पूछ रहे हैं। वह हमेशा के लिए अपनी दृष्टि में एक अच्छा व्यक्ति होने का पक्ष पूछ रहा है।

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज। सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए

अर्थ: अगर मैं इस पूरी धरती के बराबर बड़ा कागज बनाऊं और दुनियां के सभी वृक्षों की कलम बना लूँ और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है।

माखी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाए। हाथ मेल और सर धुनें, लालच बुरी बलाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मक्खी पहले तो गुड़ से लिपटी रहती है। अपने सारे पंख और मुंह गुड़ से चिपका लेती है लेकिन जब उड़ने प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती तब उसे अफ़सोस होता है। kabir ke dohe ठीक वैसे ही इंसान भी सांसारिक सुखों में लिपटा रहता है और अंत समय में अफ़सोस होता है।

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय। जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय।

अर्थ: जब मृत्यु का समय नजदीक आया और राम के दूतों का बुलावा आया तो कबीर दास जी रो पड़े क्यूंकि जो आनंद संत और सज्जनों की संगति में है उतना आनंद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यह जो शरीर है वो विष जहर से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान हैं। अगर अपना शीशसर देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी बहुत सस्ता है।

Sant Kabir Ke Dohe In Hindi

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि निंदक हमेशा दूसरों की बुराइयां करने वाले लोगों को हमेशा अपने पास रखना चाहिए, क्यूंकि ऐसे लोग अगर आपके पास रहेंगे तो आपकी बुराइयाँ आपको बताते रहेंगे और आप आसानी से अपनी गलतियां सुधार सकते हैं। इसीलिए कबीर जी ने कहा है कि निंदक लोग इंसान का स्वभाव शीतल बना देते हैं।

हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि। आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि।

अर्थ: यह शरीर तो सब जंगल के समान है, हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं। इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं, यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं।

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।

अर्थ: जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी को रौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार से कहती है – तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिटटी में विलीन हो जायेगा और मैं तुझे रौंदूंगी।

बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार। एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार।

अर्थ: एक चिकित्सक को मरना है, एक रोगी को मरना है। कबीर की मृत्यु नहीं हुई क्योंकि उन्होंने स्वयं को राम को अर्पित कर दिया था जो कि सर्वव्यापी चेतना है।

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।

अर्थ: चलती चक्की को देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चक्की के पाटों के बीच में कुछ साबुत नहीं बचता। kabir ke dohe

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय। बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।

अर्थ: यदि तू अपने को कर्ता समझता था तो चुप क्यों बैठा रहा? और अब कर्म करके पश्चात्ताप क्यों करता है? पेड़ तो बबूल का लगाया है. फिर आम खाने को कहाँ से मिलें?

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

अर्थ:कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस। मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास।

अर्थ: यदि आप मोक्ष चाहते हैं तो आपको सभी इच्छाओं को समाप्त कर देना चाहिए। एक बार जब आप मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं तो आप सब कुछ हासिल कर लेते हैं।

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात। देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान की इच्छाएं एक पानी के बुलबुले के समान हैं जो पल भर में बनती हैं और पल भर में खत्म। जिस दिन आपको सच्चे गुरु के दर्शन होंगे उस दिन ये सब मोह माया और सारा अंधकार छिप जायेगा।

ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय। सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय।

अर्थ: यदि कार्य उच्च कोटि के नहीं हैं, तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो साधु उसकी निंदा ही करेंगे। Kabir Ke Dohe In Hindi

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय। सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि लोग रोजाना अपने शरीर को साफ़ करते हैं लेकिन मन को कोई साफ़ नहीं करता। जो इंसान अपने मन को भी साफ़ करता है वही सच्चा इंसान कहलाने लायक है। kabir ke dohe

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई। अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं, प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा. जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा भरा हो गया. खुश हाल हो गया, यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते

कबीरा आप ठागइए, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।

अर्थ: किसी को भी अपने आप को मूर्ख बनाना चाहिए, दूसरों को नहीं। जो दूसरों को मूर्ख बनाता है वह दुखी हो जाता है। खुद को बेवकूफ बनाने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि वह सच्चाई को जल्द या बाद में जान जाएगा।

कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण। कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।

अर्थ:बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे। इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा।

बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश। खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश।

अर्थ: सौदागरों के बैल जैसे पीठ पर शक्कर लाद कर भी भूसा खाते हुए चारों और फेरि करते है। kabir ke dohe इस प्रकार इस प्रकार यथार्थ सद्गुरु के उपदेश बिना ज्ञान कहते हुए भी विषय. प्रपंचो में उलझे हुए मनुष्य नष्ट होते है।

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय। कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि तिनके को पाँव के नीचे देखकर उसकी निंदा मत करिये क्यूंकि अगर हवा से उड़के तिनका आँखों में चला गया तो बहुत दर्द करता है। kabir ke dohe वैसे ही किसी कमजोर या गरीब व्यक्ति की निंदा नहीं करनी चाहिए।

कबीर यह तनु जात है सकै तो लेहू बहोरि। नंगे हाथूं ते गए जिनके लाख करोडि।

अर्थ: यह शरीर नष्ट होने वाला है हो सके तो अब भी संभल जाओ, इसे संभाल लो। जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी वे भी यहाँ से खाली हाथ ही गए हैं। इसलिए जीते जी धन संपत्ति जोड़ने में ही न लगे रहो। कुछ सार्थक भी कर लो, जीवन को कोई दिशा दे लो, कुछ भले काम कर लो।

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार। हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार तो माटी का है, आपको ज्ञान पाने की कोशिश करनी चाहिए नहीं तो मृत्यु के बाद जीवन और फिर जीवन के बाद मृत्यु यही क्रम चलता रहेगा।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही। सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।

अर्थ: जब मैं अपने अहंकार में डूबा था तब प्रभु को न देख पाता था लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार। फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार।

अर्थ: मालिन को आते देखकर बगीचे की कलियाँ आपस में बातें करती हैं कि आज मालिन ने फूलों को तोड़ लिया और कल हमारी बारी आ जाएगी। भावार्थात आज आप जवान हैं कल आप भी बूढ़े हो जायेंगे और एक दिन मिटटी में मिल जाओगे। आज की कली, कल फूल बनेगी।

मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय। है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय।

अर्थ: मन-राजा बड़ा भारी व्यापारी बना और विषयों का टांडा बहुत सौदा जाकर लाद लिया। भोगों-एश्वर्यों में लाभ है-लोग कह रहे हैं, परन्तु इसमें पड़कर मानवता की पूँजी भी विनष्ट हो जाती है।

प्रेम न बड़ी उपजी, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जोही रुचे, शीश दी ले जाय।

अर्थ:कोई भी खेत में प्यार की फसल नहीं काट सकता। कोई बाज़ार में प्रेम नहीं खरीद सकता। वह जो भी प्यार पसंद करता है, वह एक राजा या एक आम आदमी हो सकता है, उसे अपना सिर पेश करना चाहिए और प्रेमी बनने के योग्य बनना चाहिए। kabir ke dohe

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय। लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।

अर्थ: जिसको ईश्वर प्रेम और भक्ति का प्रेम पाना है उसे अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा को त्यागना होगा। लालची इंसान अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा तो त्याग नहीं सकता लेकिन प्रेम पाने की उम्मीद रखता है। kabir ke dohe

बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर। कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और।

अर्थ: हते हुए को मत बहने दो, हाथ पकड़ कर उसको मानवता की भूमिका पर निकाल लो। यदि वह कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो वचन और सुना दो।

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।

कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ। सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम दे। सर पर धन की गठरी बांधकर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

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सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग। ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं उनपर कौए बैठने लगे हैं। हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता kabir ke doheजहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है, यह इस संसार में होता है।

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग। प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि अब तक जो समय गुजारा है वो व्यर्थ गया, ना कभी सज्जनों की संगति की और ना ही कोई अच्छा काम किया। प्रेम और भक्ति के बिना इंसान पशु के समान है और भक्ति करने वाला इंसान के ह्रदय में भगवान का वास होता है।

एकही बार परखिये ना वा बारम्बार। बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार।

अर्थ: किसी व्यक्ति को बस ठीक ठीक एक बार ही परख लो तो उसे बार बार परखने की आवश्यकता न होगी। रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर न होगी,इसी प्रकार मूढ़ दुर्जन को बार बार भी परखो तब भी वह अपनी मूढ़ता दुष्टता से भरा वैसा ही मिलेगा। किन्तु सही व्यक्ति की परख एक बार में ही हो जाती है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ: कबीर दास जी मन को समझाते हुए कहते हैं कि हे मन! दुनिया का हर काम धीरे धीरे ही होता है। इसलिए सब्र करो। जैसे माली चाहे कितने भी पानी से बगीचे को सींच ले लेकिन वसंत ऋतू आने पर ही फूल खिलते हैं। kabir ke dohe

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट। कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट।

अर्थ: ज्ञान से बड़ा प्रेम है, बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाए, ईंट जैसा निर्जीव हो जाए, तो क्या पाया? यदि ज्ञान मनुष्य को रूखा और कठोर बनाता है तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं। जिस मानव मन को प्रेम ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा। प्रेम की एक बूँद, एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है। kabir ke dohe

साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं। धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं।

अर्थ: साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है, वह धन का लोभी नहीं होता जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता Kabir Ke Dohe

स्वामी हूवा सीतका, पैकाकार पचास। रामनाम कांठै रह्या, करै सिषां की आस।

अर्थ: स्वामी आज-कल मुफ्त में, या पैसे के पचास मिल जाते हैं। मतलब यह कि सिद्धियाँ और चमत्कार दिखाने और फैलाने वाले स्वामी रामनाम को वे एक किनारे रख देते हैं, और शिष्यों से आशा करते हैं लोभ में डूबकर।

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार। साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि कड़वे बोल बोलना सबसे बुरा काम है, कड़वे बोल से किसी बात का समाधान नहीं होता। वहीँ सज्जन विचार और बोल अमृत के समान हैं।

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच। हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।

अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि अपशब्द एक ऐसा बीज है जो लड़ाई झगड़े, दुःख एवम् हत्या के क्रूर विचार के अंकुर को व्यक्ति के दिल में रोपित करता है। अतः जो व्यक्ति इनसे हार मान कर कर अपना मार्ग बदल लेता है वह संत हो जाता है लेकिन जो उनके साथ जीता है वह नीच होता है।

इहि उदर कई करने, जग जाच्यो निस् जाम। स्वामी-पानो जो सीरी चढयो, सर्यो ना एको काम।

अर्थ: एक व्यक्ति जो दुनिया का त्याग करता है, वह खुद को दिन-रात परेशान करता है क्योंकि वह अपने भोजन के बारे में चिंतित है। वह यह भी सोचता है कि वह स्वामी है और खुद को स्वामी कहता है। इस प्रकार वह दोनों तरीकों से हार जाता है।

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई। पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

अर्थ: मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा। kabir ke dohe

आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत। अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।

अर्थ: देखते ही देखते सब भले दिन, अच्छा समय बीतता चला गया. तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई, प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे. ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।

तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ। मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ।

अर्थ: तेरा साथी कोई भी नहीं है। सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति, भरोसा, मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता। भावार्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है। इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है। तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है, भीतर झांकता है !

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह। सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह।

अर्थ: पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है।सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? भावार्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है। निर्मम मन इस भावना को क्या जाने? kabir ke dohe

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश। जो है जा को भावना सो ताहि के पास।

अर्थ: कमल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में रहता है। लेकिन चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब जब जल में चमकता है तो कबीर दास जी कहते हैं कि कमल और चन्द्रमा में इतनी दूरी होने के बावजूद भी दोनों कितने पास है। जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब ऐसा लगता है जैसे चन्द्रमा खुद कमल के पास आ गया हो। वैसे ही जब कोई इंसान ईश्वर से प्रेम करता है वो ईश्वर स्वयं चलकर उसके पास आते हैं।

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम। ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम। kabir ke dohe

अर्थ: जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता, वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं। प्रेम जीवन की सार्थकता है। प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है। kabir ke dohe

प्रेम प्याला जो पिए, शीश दक्षिणा दे।लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का ले।

अर्थ: जो प्रेम का प्याला पीना चाहता है, उसे अपने सिर को चढ़ाकर उसका भुगतान करना चाहिए। एक लालची आदमी अपने सिर की प्रस्तुत नहीं कर सकता है। वह केवल प्यार के बारे में बात करता है।

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर। जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो इंसान दूसरे की पीड़ा और दुःख को समझता है वही सज्जन पुरुष है और जो दूसरे की पीड़ा ही ना समझ सके ऐसे इंसान होने से क्या फायदा।

हिरदा भीतर आरसी मुख देखा नहीं जाई। मुख तो तौ परि देखिए जे मन की दुविधा जाई।

अर्थ: ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु, वासनाओं की मलिनता के कारण, मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता जब मन का संशय मिट जाए

बाहर क्या दिखलाये, अंतर जपिए राम। कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम।

अर्थ: किसी दिखावे की कोई जरूरत नहीं है। आपको आंतरिक रूप से राम नाम का जाप करना चाहिए। आपको दुनिया के साथ नहीं बल्कि दुनिया के गुरु के साथ संबंध रखना चाहिए। kabir ke dohe

कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि। दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि।

अर्थ: यह शरीर लाख का बना मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं। यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा। शरीर नश्वर है, जतन करके मेहनत करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है। कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है, अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते।

ग्यानी मूल गवैया, आपन भये करता। ताते संसारी भला, मन मे रहै डरता।

अर्थ: एक व्यक्ति जो सोचता है कि उसने ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसने अपनी जड़ें खो दी हैं। अब वह सोचता है कि वह ईश्वर के समान सर्वशक्तिमान है। गृहस्थ जीवन में लगा व्यक्ति बेहतर है क्योंकि वह कम से कम भगवान से डरता है।

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास। काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास।

अर्थ: कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो? कल या परसों ये ऊंचाइयां और आप भी धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे। और ऊपर से घास उगने लगेगी। वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है, इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए। kabir ke dohe

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय। मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि कौआ किसी का धन नहीं चुराता लेकिन फिर भी कौआ लोगों को पसंद नहीं होता। वहीँ कोयल किसी को धन नहीं देती लेकिन सबको अच्छी लगती है। ये फर्क है बोली का – कोयल मीठी बोली से सबके मन को हर लेती है।

कबीर के दोहे

कलि का स्वामी लोभिया, मनसा धरी बढाई। देही पैसा ब्याज कौ, लेखा कर्ता जाई।

अर्थ: कलयुग के स्वामी को बहुत सारी बड़ाई की उम्मीद है। वह पैसा उधार देता है और बहीखाते में व्यस्त रहता है।

कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार। एक दिन है सोवना, लंबे पाँव पसार।

अर्थ: तुम क्यों सो रहे हो? कृपया उठो और भगवान को याद करो। एक दिन होगा जब एक पैर को हमेशा के लिए फैलाकर सोना होगा। kabir ke dohe

हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध। कबीर परखै साध को ताका मता अगाध।

अर्थ: हीरे की परख जौहरी जानता है, शब्द के सार, असार को परखने वाला विवेकी साधु, सज्जन होता है। कबीर कहते हैं कि जो साधु, असाधु को परख लेता है उसका मत, अधिक गहन गंभीर है।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मायाधन और इंसान का मन कभी नहीं मरा, इंसान मरता है शरीर बदलता है लेकिन इंसान की इच्छा और ईर्ष्या कभी नहीं मरती।

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं। प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं।

अर्थ: जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ। जब अहम समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले। जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ, तब अहम स्वत: नष्ट हो गया। ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ जब अहंकार गया। प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता, प्रेम की संकरी, पतली गली में एक ही समा सकता है. अहम् या परम। परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है।

कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई। चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि साधु की संगति कभी निष्फल नहीं होती। चन्दन का वृक्ष यदि छोटा, वामन, बौना भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा। वह सुवासित ही रहेगा और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा। आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा। Kabir Ke Dohe

कलि का स्वामी लोभिया, पीतली धरी खटाई। राज-दुबारा यू फिराई, ज्यू हरिहाई गाई।

अर्थ: इस कलयुग में जो खुद को स्वामी कहता है वह लालची हो गया है। वह खट्टी वस्तुओं के साथ पीतल के बर्तन जैसा दिखता है। वह एक गाय की तरह शासक की सुरक्षा चाहता है जो हरे चरागाह को देखकर भागता है। Kabir Ke Dohe

कामी लज्या ना करई, मन माहे अहीलाड़। नींद ना मगई संतरा, भूख ना मगई स्वाद।

अर्थ: जुनून की चपेट में आए व्यक्ति को शर्म नहीं आती। वह जो बहुत नींद में है, बिस्तर की परवाह नहीं करता है और जो बहुत भूखा है, वह अपने स्वाद के बारे में परेशान नहीं है। Kabir Ke Dohe

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह। झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह।

अर्थ: जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दूना प्रेम बढ़ता है। पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है। kabir ke dohe

आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर। इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो इस दुनियां में आया है उसे एक दिन जरूर जाना है। चाहे राजा हो या फ़क़ीर, अंत समय यमदूत सबको एक ही जंजीर में बांध कर ले जायेंगे।

प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए। राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि प्रेम कहीं खेतों में नहीं उगता और नाही प्रेम कहीं बाजार में बिकता है। जिसको प्रेम चाहिए उसे अपना शीशक्रोध, काम, इच्छा, भय त्यागना होगा।

मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ। पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ।

अर्थ: मन की इच्छा छोड़ दो।उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते। यदि जल से घी निकल आवे, तो रूखी रोटी कोई भी न खाएगा।

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार। कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।

अर्थ: घर दूर है मार्ग लंबा है रास्ता भयंकर है और उसमें अनेक पातक चोर ठग हैं। हे सज्जनों, कहो. भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो? संसार में जीवन कठिन है, अनेक बाधाएं हैं विपत्तियां हैं। उनमें पड़कर हम भरमाए रहते हैं, बहुत से आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं। हम अपना लक्ष्य भूलते रहते हैं, अपनी पूंजी गंवाते रहते हैं।

ब्रह्मन गुरू जगत का, साधु का गुरू नाही। उर्झी-पुरझी करी मरी राह्य, चारिउ बेडा माही।

अर्थ: एक ब्राह्मण दुनिया का गुरु हो सकता है लेकिन वह एक अच्छे इंसान का गुरु नहीं है। ब्राह्मण हमेशा वेदों की व्याख्या के साथ शामिल होता है और वह ऐसा करते हुए मर जाता है। kabir ke dohe

कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।

अर्थ: बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है। kabir ke dohe

ते दिन गए अकार्थी , सांगत भाई न संत। प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत।

अर्थ: मैंने उन दिनों को बर्बाद किया जब मैं अच्छे लोगों से नहीं मिला था। बिना प्यार वाला इंसान जानवर होता है। प्रेम के बिना कोई देवत्व नहीं है।

मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख। मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मांगना तो मृत्यु के समान है, कभी किसी से भीख मत मांगो। मांगने से भला तो मरना है।

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि वे लोग अंधे और मूर्ख हैं जो गुरु की महिमा को नहीं समझ पाते। अगर ईश्वर आपसे रूठ गया तो गुरु का सहारा है लेकिन अगर गुरु आपसे रूठ गया तो दुनियां में कहीं आपका सहारा नहीं है।

दया भाव ह्रदय नहीं, ज्ञान थके बेहद। ते नर नरक ही जायेंगे, सुनी सुनी साखी शब्द।

अर्थ: उनके दिल में कोई दया नहीं है। ज्ञान प्राप्त करने के श्रम के कारण वे थक गए हैं। वे निश्चित रूप से नरक में जाएंगे क्योंकि वे कुछ और नहीं बल्कि शुष्क शब्दों को जानते हैं। kabir ke dohe

गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह। आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह।

अर्थ: जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर – शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले लो। kabir ke dohe

कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर। ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर।

अर्थ: लौह धातु से तलवार भी बनती है और बख्तर भी। आप एक विध्वंसक भी हो सकते हैं और रक्षक भी, यह आप पर निर्भर है।

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं। पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं।

अर्थ: इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं। सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं।

चतुराई सूवई पड़ी, सोई पंजर माही। फिरी प्रमोधाई आन कौ, आपन समझाई नाही।

अर्थ: एक तोता दोहराता है जो भी ज्ञान पढ़ाया जाता है, लेकिन वह खुद को अपने पिंजरे से मुक्त करने का तरीका नहीं जानता है। लोगों ने आज बहुत ज्ञान प्राप्त किया है, लेकिन वे खुद को मुक्त करने में विफल हैं। kabir ke dohe

परबत परबत मै फिरया, नैन गवाए रोई। सो बूटी पौ नहीं, जताई जीवनी होई।

अर्थ: कबीर ने एक पर्वत से दूसरे पर्वत की खोज की, लेकिन वह जीवन को बनाने वाली जड़ी बूटी नहीं पा सके।

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय। यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए।

अर्थ: अगर हमारा दिमाग शांत है तो दुनिया में कोई दुश्मन नहीं हैं। अगर हमारे पास अहंकार नहीं है तो सभी हमारे लिए दयालु हैं।

मूल ध्यान गुरू रूप है, मूल पूजा गुरू पाव। मूल नाम गुरू वचन हाई, मूल सत्य सतभाव।

अर्थ: अपने गुरु के रूप को देखें। अपने गुरु के चरण कमलों की पूजा करें। अपने गुरु के वचनों को सुनें और स्वयं को सत्यता की स्थिति में बनाए रखें।

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय। सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म तो ले लिया लेकिन अगर कर्म ऊँचे नहीं है तो ये तो वही बात हुई जैसे सोने के लोटे में जहर भरा हो, इसकी चारों ओर निंदा ही होती है। kabir ke dohe

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि। मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे आँख के अंदर पुतली है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा है। मूर्ख लोग नहीं जानते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं। kabir ke dohe

मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह। ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह।

अर्थ: मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह.सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है।

देह धरे का दंड है सब काहू को होय । ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय।

अर्थ: देह धारण करने का दंड, भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है। अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए, दुखी मन से सब कुछ झेलता है। kabir ke dohe

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय। भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय।

अर्थ: एक छाया और एक भ्रम समान हैं। वे उनका पीछा करते हैं जो दूर भागते हैं और उस नज़र से गायब हो जाते हैं जो उन्हें देखता है।

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह। ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु।

अर्थ: जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना।

कबीर एक न जन्या, तो बहु जनया क्या होई। एक तै सब होत है, सब तै एक न होई।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि आप एक चीज नहीं जानते हैं और आप कई अन्य चीजों को जानते हैं। यह एक बात सभी को पूरा कर सकती है, ये कई चीजें बेकार हैं। kabir ke dohe

तीरथ करी करी जाग मुआ, दूंघे पानी नहाई। रामही राम जापन्तदा, काल घसीट्या जाई।

अर्थ: तीर्थयात्री के रूप में लोग कई स्थानों पर जाते हैं। वे ऐसे स्थानों पर स्नान करते हैं। वे हमेशा ईश्वर के नाम का जाप करते हैं लेकिन फिर भी, उन्हें समय के साथ मौत के घाट उतार दिया जाता है।

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव। स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव।

अर्थ: अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान पर भी मत जाओ। क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे।

जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि। जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि।

अर्थ:जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे। जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर, उसे ही याद रख, उसे ही संवार सुन्दर बना। kabir ke dohe

झिरमिर – झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह। माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह।

अर्थ: बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे। इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा।

गुरू मूर्ति अगे खडी, दुनिया भेद कछू हाही। उन्ही को पर्नाम करी, सकल तिमिर मिटि जाही।

अर्थ: आपका गुरु आपको नेतृत्व करने के लिए है। जीवन को कैसे ध्वस्त करना है, इस बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप अपने गुरु के उपदेश का पालन करते हैं तो वहां अंधेरा नहीं होगा।

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी। एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि तू क्यों हमेशा सोया रहता है, जाग कर ईश्वर की भक्ति कर, नहीं तो एक दिन तू लम्बे पैर पसार कर हमेशा के लिए सो जायेगा। kabir ke dohe

जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही। ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही। kabir ke dohe

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जिस घर में साधु और सत्य की पूजा नहीं होती, उस घर में पाप बसता है। ऐसा घर तो मरघट के समान है जहाँ दिन में ही भूत प्रेत बसते हैं।

जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम। दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम।

अर्थ: वह जो भगवान को याद करता है वह कोई कामुक सुख नहीं जानता है। वह जो भगवान को याद नहीं करता है वह कामुक सुखों का आनंद लेता है। भगवान और कामुक सुख एकजुट नहीं हुए क्योंकि सूर्य और रात का कोई मिलन नहीं हो सकता।

भारी कहौ तो बहु दरौ, हलका कहु टू झूत। माई का जानू राम कू, नैनू कभू ना दीथ।

अर्थ: अगर मैं कहूं कि राम भारी हैं, तो इससे मन में भय पैदा होता है। अगर मैं कहूं कि वह हल्का है, यह बेतुका है। मैं राम को नहीं जानता क्योंकि मैंने उन्हें देखा नहीं था।

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय। हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि रात को सोते हुए गँवा दिया और दिन खाते खाते गँवा दिया। आपको जो ये अनमोल जीवन मिला है वो कोड़ियों में बदला जा रहा है।

पतिबरता मैली भली, गले कांच को पोत। सब सखियाँ में यो दिपै, ज्यो रवि ससी को ज्योत।

अर्थ: अपने परिवार के लिए प्रतिबद्ध एक महिला अपने पुराने वस्त्र और गले में कांच के मोतियों की लेस में बेहतर दिखती है। वह अपनी सहेलियों के बीच ऐसे चमकती है जैसे चाँद सितारों के बीच चमकता है।

माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर। आसा त्रिष्णा णा मुई यों कहि गया कबीर।

अर्थ: न माया मरती है न मन शरीर न जाने कितनी बार मर चुका। आशा, तृष्णा कभी नहीं मरती, ऐसा कबीर कई बार कह चुके हैं।

जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश। तन मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश। kabir ke dohe

अर्थ: शरीर रहते हुए तो कोई यथार्थ ज्ञान की बात समझता नहीं, और मार जाने पर इन्हे कौन उपदेश करने जायगा। जिसे अपने तन मन की की ही सुधि बूधी नहीं हैं, उसको क्या उपदेश किया?

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ: जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।

कबीर इस संसार को, समझौ कई बार। पूंछ जो पकडई भेड़ की, उत्रय चाहाई पार।

अर्थ: कबीर लोगों को यह बताने से तंग आ गए कि उन्हें मूर्खतापूर्ण तरीके से पूजा करने से बचना चाहिए। लोगों को लगता है कि वे एक भेड़ की पूंछ को पकड़कर पारगमन के महासागर को पार करेंगे। kabir ke dohe

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं।

अर्थ: कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता और कभी भी धन का भूखा नहीं होता। और जो धन का भूखा होता है वह साधू नहीं हो सकता।

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव। लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव।

अर्थ: इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूं, इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? ईश्वर से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन – मन को लगाना एक साधना है तपस्या है। जिसे कोई कोई विरला ही कर पाता है।

भगती बिगाड़ी कामिया, इन्द्री करे सवादी। हीरा खोया हाथ थाई, जनम गवाया बाड़ी।

अर्थ: एक वासनाग्रस्त व्यक्ति ने उसकी भक्ति को नुकसान पहुंचाया है और उसके इंद्रिय-अंगों को स्वाद का आनंद मिल रहा है। उसने एक हीरे को खो दिया है और जीवन का सार चूक गया है। kabir ke dohe

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति।

अर्थ: मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई अहंकार सब नष्ट हो गया जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म, विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया

गुरू बिन ज्ञान न उपजई, गुरू बिन मलई न मोश। गुरू बिन लाखाई ना सत्य को, गुरू बिन मिटे ना दोष।

अर्थ: बिना गुरु के कोई ज्ञान नहीं हो सकता, गुरु के बिना कोई मोक्ष नहीं हो सकता, गुरु के बिना सत्य की कोई प्राप्ति नहीं हो सकती। और बिना गुरु के दोषों को दूर नहीं किया जा सकता है।

साधु शब्द समुद्र है, जामे रत्न भराय। मंद भाग मुट्ठी भरे, कंकर हाथ लगाये। kabir ke dohe

अर्थ: साधु द्वारा कहा गया एक अच्छा शब्द सागर जितना गहरा है। एक मूर्ख सिर्फ मुट्ठी भर रेत हासिल करता है।

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ। खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ।

अर्थ: जो जाता है उसे जाने दो। तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो। यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे। kabir ke dohe

कबीर मन फुल्या फिरे, कर्ता हु मई धम्म। कोटी क्रम सिरी ले चल्या, चेत ना देखई भ्रम।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि लोग इस सोच के साथ फूले थे कि इतनी योग्यता अर्जित की जा रही है। वे यह देखने में विफल रहते हैं कि उन्होंने इस तरह के अहंकार के कारण कई कर्म बनाए हैं। उन्हें जागना चाहिए और इस भ्रम को दूर करना चाहिए।

तीर तुपक से जो लादे, सो तो शूर न होय। माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय।

अर्थ: धनुष और बाण से लड़ता है, वह वीर नहीं है। असली बहादुर वह है जो भ्रम को दूर भगाता है और भक्त बन जाता है।

कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय। अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए।

अर्थ: मत करो, गर्व महसूस मत करो। दूसरों पर हँसो मत। आपका जीवन सागर में एक जहाज है जिसे आप नहीं जानते कि अगले क्षण क्या हो सकता है। Kabir Ke Dohe

न गुरु मिल्या ना सिष भय, लालच खेल्या डाव। दुनयू बड़े धार में, छधी पाथर की नाव।

अर्थ: जो लोग लालच से प्रेरित होते हैं वे अपने शिष्य और गुरु का दर्जा खो देते हैं। पत्थर की एक नाव पर चढ़ते ही दोनों बीच में डूब गए।

धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर। अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।

अर्थ: धर्म परोपकार, दान सेवा करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो।

जा कारनी मे ढूँढती, सन्मुख मिलिया आई। धन मैली पीव ऊजला, लागी ना सकौ पाई।

अर्थ: मैं उसे खोज रहा था। मैं उनसे आमने-सामने मिला। वह शुद्ध है और मैं गंदा हूं। मैं उसके चरणों में कैसे झुक सकता हूं?

मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास। मेरी पग का पैषणा मेरी गल की पास।

अर्थ: ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो, यह मेरा है कि रट मत लगाओ, ये विनाश के मूल हैं, जड़ हैं, कारण हैं, ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है।

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत। सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत। kabir ke dohe

अर्थ: पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी है। चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो। फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है ।

जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर। जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर।

अर्थ: जिस भ्रम तथा मोह की रस्सी से जगत के जीव बंधे है। हे कल्याण इच्छुक ! तू उसमें मत बंध। नमक के बिना जैसे आटा फीका हो जाता है। वैसे सोने के समान तुम्हारा उत्तम नर शरीर भजन बिना व्यर्थ जा रहा हैं। kabir ke dohe

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी। एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी।

अर्थ: अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है. जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते?

कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे हॉट न हार। साधू बचन जल रूप है, बरसे अमृत धार।

अर्थ: एक बुरे शब्द ने कहा कि दूसरों को पीड़ा देना इस दुनिया में सबसे बुरी बात है। बुरे शब्द सुनने से किसी की हार नहीं होती। एक अच्छा शब्द जो दूसरों को भिगोता है वह पानी की तरह है और यह सुनने वालों पर अमृत की वर्षा करता है।

गुरू मूर्ती गती चंद्रमा, सेवक नैन चकोर। आठ पहर निरखता रहे, गुरू मूर्ती की ओर।

अर्थ: जैसा कि एक चकोर हमेशा चंद्रमा को देखता है, हमें हमेशा गुरु के कहे अनुसार चलना चाहिए।

ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय। नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय।

अर्थ: पानी नीचे बहता है। और यह हवा में लटका नहीं रहा। जो लोग जमीनी हकीकत जानते हैं वे पानी का आनंद लेते हैं, जो हवा में तैर रहे हैं वे नहीं कर सकते।

पूत पियारौ पिता कू, गोहनी लागो धाई। लोभ मिथाई हाथि दे, अपन गयो भुलाई। kabir ke dohe

अर्थ: एक बच्चा अपने पिता को बहुत पसंद करता है। वह अपने पिता का अनुसरण करता है और उसे पकड़ लेता है। पिता उसे कुछ मिठाई देते हैं। बच्चा मिठाई का आनंद लेता है और पिता को भूल जाता है। हमें ईश्वर को नहीं भूलना चाहिए जब हम उसके एहसानों का आनंद लेते हैं।

कबीर भाथी कलाल की, बहुतक बैठे आई। सिर सौपे सोई पेवाई, नही तौऊ पिया ना जाई।

अर्थ: अमृत की दुकान में आपका स्वागत है। यहाँ पर कई बैठे हैं। किसी के सिर पर हाथ फेरना चाहिए और एक गिलास अमृत प्राप्त करना चाहिए।

परनारी रता फिरे, चोरी बिधिता खाही। दिवस चारी सरसा रही, अति समूला जाहि।

अर्थ: एक पुरुष जो दूसरों से संबंधित महिला को प्रसन्न करता है, वह रात में चोर की तरह भागता है। वह कुछ दिनों के लिए सुख का मतलब निकालता है और फिर अपनी सारी जड़ों के साथ नष्ट हो जाता है। kabir ke dohe

जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी। राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारी।

अर्थ: क्या शानदार क्षण था। मैं एक अच्छे व्यक्ति से मिला। मैंने राम का जप किया और अपने पूरे जीवन में अच्छा किया।

संगती सो सुख उपजे, कुसंगति सो दुःख होय। कह कबीर तह जाइए, साधू संग जहा होय।

अर्थ: एक अच्छी संगति खुशी पैदा करती है और एक बुराई दुख पैदा करती है। अच्छे लोगों के बीच हमेशा रहना चाहिए।

प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय। चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाए।

अर्थ: आप घर पर रह सकते हैं या आप जंगल जा सकते हैं। यदि आप ईश्वर से जुड़े रहना चाहते हैं, तो आपके दिल में प्यार होना चाहिए। Kabir Ke Dohe

बिन रखवाले बाहिरा चिड़िये खाया खेत। आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत।

अर्थ: रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया। कुछ खेत अब भी बचा है, यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ, उसे बचा लो। जीवन में असावधानी के कारण इंसान बहुत कुछ गँवा देता है, उसे खबर भी नहीं लगती,

नुक्सान हो चुका होता है, यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं। इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को, जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

शीलवंत सबसे बड़ा सब रतनन की खान। तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन।

अर्थ: शांत और शीलता सबसे बड़ा गुण है और ये दुनिया के सभी रत्नों से महंगा रत्न है। जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है। kabir ke dohe

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: जीवन में जो लोग हमेशा प्रयास करते हैं वो उन्हें जो चाहे वो पा लेते हैं जैसे कोई गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ न कुछ पा ही लेता हैं। लेकिन कुछ लोग गहरे पानी में डूबने के डर से यानी असफल होने के डर से कुछ करते ही नहीं और किनारे पर ही बैठे रहते हैं।

या दुनिया में आ कर, छड़ी डे तू एट। लेना हो सो लिले, उठी जात है पैठ।

अर्थ: यहां किसी को भी नहीं घूमना चाहिए। किसी भी समय को बर्बाद किए बिना सभी सौदे करने चाहिए क्योंकि काम के घंटे जल्द ही खत्म हो जाएंगे।

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत। सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो, जो बारहों महीने फल देता हो। जिसकी छाया शीतल हो, फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों।

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच। हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच।

अर्थ: गाली से झगड़ा सन्ताप एवं मरने मारने तक की बात आ जाती है। इससे अपनी हार मानकर जो विरक्त हो चलता है वह सन्त है, और गाली गलौच एवं झगड़े में जो व्यक्ति मरता है, वह नीच है।

करता केरे गुन बहुत औगुन कोई नाहिं। जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं।

अर्थ: प्रभु में गुण बहुत हैं, अवगुण कोई नहीं है। जब हम अपने ह्रदय की खोज करते हैं तब समस्त अवगुण अपने ही भीतर पाते हैं।

साधू सती और सुरमा, इनकी बात अगाढ़। आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध।

अर्थ: एक अच्छा व्यक्ति, एक महिला जो अपने पति की चिता पर जलती है और एक बहादुर आदमी, इनकी बात ही और है। वे अपने शरीर के साथ क्या होता है, इससे चिंतित नहीं हैं। kabir ke dohe

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ। ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ।

अर्थ: हे प्रिय, प्रभु तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं। फिर न तो मैं किसी दूसरे को देखूं और न ही किसी और को तुम्हें देखने दूं।

मानुष जन्म दुलभ है, देह न बारम्बार। तरवर थे फल झड़ी पड्या,बहुरि न लागे डारि।

अर्थ: मानव जन्म पाना कठिन है। यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुन: उसकी डाल पर नहीं लगता। Kabir Ke Dohe

गुरु को सर रखिये, चलिए आज्ञा माहि। कहै कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाही।

अर्थ: वह जो अपने गुरु को अपने सिर पर रखता है और उसके निर्देशों का पालन करता है, उसे तीनों लोकों में कोई भय नहीं है।

पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल। कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल।

अर्थ: बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है, ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?

कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह। देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह। kabir ke dohe

अर्थ: जब तक यह देह है तब तक तू कुछ न कुछ देता रह। जब देह धूल में मिल जायगी, तब कौन कहेगा कि ‘दो’।

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय। साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय।

अर्थ: उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट दुष्टोंतथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।

कबीर कलि खोटी भाई, मुनियर मिली न कोय। लालच लोभी मस्कारा, टिंकू आदर होई।

अर्थ: यह कलयुग का युग है। यहाँ एक व्यक्ति जो संयम की भावना रखता है वह दुर्लभ है। लोग लालच, लोभ और त्रासदी से लबरेज हैं।

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय। कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।

कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई। नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है। वहां काजल नहीं दिया जा सकता। जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है? kabir ke dohe

कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन। कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।

अर्थ: कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है।

कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ। बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि यदि चंदन के वृक्ष के पास नीम का वृक्ष हो तो वह भी कुछ सुवास ले लेता है। चंदन का कुछ प्रभाव पा लेता है। लेकिन बांस अपनी लम्बाई, बडेपन, बड़प्पन के कारण डूब जाता है। इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए। संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए, आपने गर्व में ही न रहना चाहिए।

बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार। औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार।

अर्थ: हे दास ! तू सद्गुरु की सेवा कर, तब स्वरूप-साक्षात्कार हो सकता है। इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर फिर से बारम्बार न मिलेगा।

देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह। निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह।

अर्थ: मरने के पश्चात् तुमसे कौन देने को कहेगा? अतः निश्चित पूर्वक परोपकार करो, यही जीवन का फल है।

यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ। ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ।

अर्थ: यह शरीर कच्चा घड़ा है जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता था।जरा-सी चोट लगते ही यह फूट गया। कुछ भी हाथ नहीं आया।

गुरु सामान दाता नहीं, याचक सीश सामान। तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।

अर्थ: गुरु के समान कोई दाता नहीं है और शिष्य के समान कोई साधक नहीं है। गुरु शिष्य को तीनों लोकों का अनुदान देते हैं।

काची काया मन अथिर थिर थिर काम करंत। ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त।

अर्थ: शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है परन्तु तुम इन्हें स्थिर मान कर काम करते हो। इन्हें अनश्वर मानते हो मनुष्य जितना इस संसार में रमकर निडर घूमता है। मगन रहता है. उतना ही काल अर्थात मृत्यु उस पर हँसता है ! मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है, कितनी दुखभरी बात है।

कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख। स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीख।

अर्थ: जो लोग एक अच्छा गुरु नहीं पाते हैं वे अधूरे ज्ञान प्राप्त करते हैं। वे एक वैरागी के वस्त्र पहनते हैं और घर-घर जाकर भीख मांगते हैं।

हरी सांगत शीतल भय, मिति मोह की ताप। निशिवासर सुख निधि, लाहा अन्न प्रगत आप्प।

अर्थ: जो भगवान को महसूस करते हैं वे शांत हो जाते हैं। उन्होंने अपनी गर्मी को खत्म कर दिया। वे दिन-रात आनंदित होते हैं।

कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव। सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उसअतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है, कुछ प्राप्त नहीं कर पाता।

मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै। काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े।

अर्थ: मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?

क्काज्ल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट। पांहनि बोई पृथमीं,पंडित पाड़ी बात।

अर्थ: यह संसार काजल की कोठरी है, इसके कर्म रूपी कपाट कालिमा के ही बने हुए हैं। पंडितों ने पृथ्वीपर पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करके मार्ग का निर्माण किया है।

इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति। कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति।

अर्थ: उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहाँ पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए।

कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड। सतगुरु की कृपा भई, नहीं तोउ करती भांड।

अर्थ: भ्रम या माया बहुत प्यारी है। भगवान का शुक्र है कि मुझे अपने गुरु का आशीर्वाद मिला अन्यथा मैं कोरा होता।

साहेब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय। ज्यो मेहंदी के पात में, लाली राखी न जाय।

अर्थ: मेरे स्वामी, आपकी महारत सभी प्राणियों में है। उसी तरह जैसे मेंहदी में लालिमा होती है।

प्रेम न बाडी उपजे प्रेम न हाट बिकाई। राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाई।

अर्थ: प्रेम खेत में नहीं उपजता प्रेम बाज़ार में नहीं बिकता चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा, यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा। त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता। प्रेम गहन – सघन भावना हैखरीदी बेचे जाने वाली वस्तु नहीं

जो तोकू कांता बुवाई, ताहि बोय तू फूल। तोकू फूल के फूल है, बंकू है तिरशूल।

यदि कोई आपके लिए कांटेदार कैक्टस बोता है, तो आपको उसके लिए एक फूल वाला पौधा बोना चाहिए। आपको बहुत से फूल मिलेंगे। और दूसरों के पास कांटे होंगे। Kabir Ke Dohe

या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत। गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत।

अर्थ: इस संसार का झमेला दो दिन का है. अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो। सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं।

kabir das ke dohe in hindi

कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार। करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार।

अर्थ: कबीर कहते हैं शरीर रूपी देवालय नष्ट हो गया, उसकी ईंट ईंट, अर्थात शरीर का अंग अंग, शैवाल अर्थात काई में बदल गई। इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम कर जिससे यह देवालय दूसरी बार नष्ट न हो।

साईं आगे सांच है, साईं सांच सुहाय। चाहे बोले केस रख, चाहे घौत मुंडाय।

अर्थ: ईश्वर सत्य को देखता है। भगवान को सच्चाई पसंद है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई लंबे बाल उगा सकता है या वह सारे बाल मुंडवा सकता है।

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी। फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यौ गयानी।

अर्थ: जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता है इस तरह देखें तो, बाहर और भीतर पानी ही रहता है। पानी की ही सत्ता है। जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है।

अलगाव नहीं रहता ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं। आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं, आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है।

अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है, जब देह विलीन होती है। वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है। उसी में समा जाती है। एकाकार हो जाती है।

कामी अमि नॅ ब्वेयी, विष ही कौ लई सोढी। कुबुद्धि ना जाई जीव की, भावै स्वमभ रहौ प्रमोधि।

अर्थ: वासना का आदमी अमृत की तरह नहीं जीता। वह हमेशा जहर खोजता है। भले ही भगवान शिव स्वयं मूर्ख को उपदेश देते हों, मूर्ख अपनी मूर्खता से बाज नहीं आता।

मेरे संगी दोई जरग, एक वैष्णो एक राम। वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम।

अर्थ: मेरे केवल दो साथी, भक्त और राम हैं। वोमुझे भगवान को याद करने और मोक्ष प्रदान करने के लिए प्रेरित करते हैं।

लकड़ी कहे लुहार की, तू मति जारे मोहि। एक दिन ऐसा होयगा, मई जरौंगी तोही।

अर्थ: लकड़ी एक लोहार से कहती है कि आज अपनी जीविका के लिए तुम मुझे जला रहे हो। एक दिन, मैं तुम्हें चिता पर जला दूंगी।

कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर। इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर।

अर्थ: सन्तों के साधी विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल जब परिपूर्ण रूप से ह्रदय में आया। तब सन्तों ने इद्रियों को रोककर शरीर की व्याधियों को धूल कर दिया। भावार्थात् तन-मन को वश में कर लिया।

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय। जनम जनम का मोर्चा, पल में दारे धोय।

अर्थ: एक शिष्य अज्ञानता के कीचड़ से भरा है। गुरु ज्ञान का जल है। जो भी अशुद्धियाँ कई जन्मों में जमा होती हैं, वह एक क्षण में साफ हो जाती है।

आवत गारी एक है, उलटन होए अनेक। कह कबीर नहीं उलटिए, वही एक की एक।

अर्थ: अगर कोई हमें अपशब्द कहता है, तो हम गाली के कई शब्द वापस देते हैं। कबीर कहते हैं कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। गाली का एक शब्द एक ही रहने दो।

साधू ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय. सार सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ: जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता हैं वैसे इस दुनिया में सज्जनों की जरुरत हैं जो सार्थक चीजों को बचा ले और निरर्थक को चीजों को निकाल दे।

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास। समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है। स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है। हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है।

कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर। जो पर पीर न जानई सो काफिर बेपीर।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि सच्चा पीर, संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को जानता है जो दूसरे के दुःख को नहीं जानते वे बेदर्द हैं. निष्ठुर हैं और काफिर हैं।

ज्ञान रतन का जतानकर, माटि का संसार। आय कबीर फिर गया, फीका है संसार।

अर्थ: ज्ञान के रत्न की देखभाल करनी चाहिए। सांसारिक अस्तित्व बेकार है। कबीर ने दुनिया से मुंह मोड़ लिया क्योंकि दुनिया फीकी है।

तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी। मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे।

अर्थ: तुम कागज़ पर लिखी बात को सत्य कहते हो, तुम्हारे लिए वह सत्य है जो कागज़ पर लिखा है। किन्तु मैं आंखों देखा सच ही कहता और लिखता हूँ। कबीर पढे-लिखे नहीं थे पर उनकी बातों में सचाई थी। मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ। तुम उसे उलझा कर क्यों रख देते हो? जितने सरल बनोगे. उलझन से उतने ही दूर हो पाओगे।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

अर्थ: यह शरीर जहर का एक थैला है। गुरु अमृत की खान है। यदि आपको अपना सिर कुर्बान करके उपदेश मिलता है, तो यह एक सस्ता सौदा होना चाहिए।

कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार। हलके हलके तिरि गए बूड़े तिनि सर भार।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं, जिनके सर पर विषय वासनाओं का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं. संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते, उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं. हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं।

जब ही नाम हिरदय धर्यो, भयो पाप का नाश। मानो चिनगी अग्नि की, परी पुरानी घास।

अर्थ: एक बार जब आप भगवान को याद करते हैं तो यह सभी पापों का विनाश करता है। यह सूखी घास के ढेर से संपर्क करने वाली आग की चिंगारी की तरह है।

सब काहू का लीजिये, साचा असद निहार। पछ्पात ना कीजिये, कहै कबीर विचार।

अर्थ: आपको हर किसी से सच सुनना चाहिए। कोई पक्षपात दिखाने की जरूरत नहीं है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ: मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।

उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय। एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय।

अर्थ: कपड़े बहुत प्रभावशाली हैं, मुंह पान सुपारी से भरा है। लेकिन क्या आप नरक से बचना चाहते हैं तो आपको भगवान को याद करना चाहिए।

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत। साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत।

अर्थ: गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत। कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।

अर्थ: जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं।यदि मनुष्य मन में हार गया. निराश हो गया तो पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं, यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार। कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार।

अर्थ: दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है। समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है। जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे गुहार करूं, विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं। सभी का अंत एक है।

तिनका कबहूँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, कबहूँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: अपने इस दोहे में संत कबीरदासजी कहते हैं की एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा न करो जैसे वो पैरों के नीचे आकर बुझ जाता हैं वैसे ही वो उड़कर आँख में चला जाये तो बहोत बड़ा घाव देता हैं।

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह। शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह।

अर्थ: विनम्रता आनंद का असीम सागर है। कोई भी राजनीति की गहराई को नहीं जान सकता। जैसा कि बिना पैसे वाला व्यक्ति अमीर नहीं हो सकता, एक व्यक्ति विनम्र हुए बिना अच्छा नहीं हो सकता।

क्या मुख ली बिनती करो, लाज आवत है मोहि। तुम देखत ओगुन करो, कैसे भावो तोही।

अर्थ: मुझे भगवान से कोई अनुरोध कैसे करना चाहिए? वह सब जानता है, वह मेरी कमियों को जानता है। इन कमियों के साथ वह मुझे कैसे पसंद करना चाहिए?

बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच। बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच।

अर्थ: हे नीच मनुष्य ! सुन, मैं बारम्बार तेरे से कहता हूं। जैसे व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मार जाता है। वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा।

संत न बंधे गाठ्दी, पेट समाता तेई। साईं सू सन्मुख रही, जहा मांगे तह देई।

अर्थ: ज्यादा संचय करने की जरूरत नहीं है। किसी एक के व्यवहार में हमेशा ईमानदार रहने की जरूरत है।

Some Popular Kabir Ke Dohe

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग। तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग।

अर्थ: बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला, कपट से भरा है. उससे तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है।

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

अर्थ: जैसे कोई आम के पेड़ को रोज बहोत सारा पानी डाले और उसके नीचे आम आने की रह में बैठा रहे तो भी आम ऋतु में ही आयेंगे, वैसे ही धीरज रखने से सब काम हो जाते हैं।

कबीर कलिजुग आई करी, कीये बहुत जो मीत। जिन दिलबंध्या एक सू, ते सुखु सोवै निचींत।

अर्थ: इस कलयुग में, लोग कई दोस्त बनाते हैं। जो लोग अपने मन को भगवान को अर्पित करते हैं वे बिना किसी चिंता के सो सकते हैं।

दीथा है तो कस कहू, कह्य ना को पतियाय। हरी जैसा है तैसा रहो, तू हर्शी-हर्शी गुन गाई।

अर्थ: जिन लोगों ने राम का वर्णन करने की कोशिश की है, उन्हें अपने प्रयासों में असफल होने पर पछताना पड़ता है। मुझे उसका वर्णन करने में कोई परेशानी नहीं हुई, मैं खुशी-खुशी उसके गुण गाऊंगा।

फल कारन सेवा करे, करे ना मन से काम। कहे कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुना दाम।

अर्थ: वह भगवान की सेवा के लिए कुछ नहीं कर रहा है। वह जो कुछ भी करता है उसके बदले में चार गुना उम्मीद करता है। वह भगवान का भक्त नहीं है।

जिस मरने यह जग डरे, सो मेरे आनंद। कब महिहू कब देखिहू, पूरण परमानन्द।

अर्थ: पूरी दुनिया मौत से डरती है। मुझे मौत देखकर खुशी हुई। मैं कब मरूंगा और पूर्ण आनंद का एहसास करूंगा?

हरी – रस पीया जानिये, जे कबहु ना जाई खुमार। मैमन्ता घूमत रहाई, नाही तन की सार।

अर्थ: जो लोग भक्ति के रस का स्वाद चखते हैं, वे हमेशा उस स्वाद में रहते हैं। उनके पास अहंकार नहीं है और वे कामुक सुख के बारे में कम से कम परेशान हैं।

गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै। कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै। गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै।

अर्थ: यदि अपने ह्रदय में थोड़ी भी सहन शक्ति हो, ओ मिली हुई गली भारी ज्ञान है। सहन करने से करोड़ों काम संसार में सुधर जाते हैं। और शत्रु आकर पैरों में पड़ता है। यदि ज्ञान ह्रदय में आ जाय. तो मिली हुई गाली से अपनी क्या हानि है?

राम पियारा छड़ी करी, करे आन का जाप। बेस्या कर पूत ज्यू, कहै कौन सू बाप।

अर्थ: यदि कोई ईश्वर को भूल जाता है और कुछ और याद करता है, तो वह एक वेश्या के बेटे की तरह है जो यह नहीं जानता कि उसका पिता कौन है।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

कबीर हरी सब को भजे, हरी को भजै न कोई। जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होई।

अर्थ: भगवान सबको याद करते हैं। भगवान को कोई याद नहीं करता। जो लोग कामुक सुख के बारे में चिंतित हैं वे भगवान के भक्त नहीं हो सकते।

कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा। कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि हमारा यह शरीर मृत्यु के करीब पहुंच रहा है। हमें कुछ सार्थक करना चाहिए। हमें अच्छे लोगों की सेवा करनी चाहिए। हमें भगवान के गुण को याद रखना चाहिए।

जबलग भागती सकामता, तबलग निर्फल सेव। कहई कबीर वई क्यो मिलई, निहकामी निज देव।

अर्थ: जब तक भक्ति सशर्त होती है तब तक उसे कोई फल नहीं मिलता। लगाव वाले लोगों को कुछ ऐसा कैसे मिल सकता है जो हमेशा अलग हो?

माला फेरत जग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: जब कोई व्यक्ति काफ़ी समय तक हाथ में मोती की माला लेकर घुमाता हैं लेकिन उसका भाव नहीं बदलता। संत कबीरदास ऐसे इन्सान को एक सलाह देते हैं की हाथ में मोतियों की माला को फेरना छोड़कर मन के मोती को बदलो।

कबीर कूता राम का, मुटिया मेरा नाऊ। गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊं।

अर्थ: कबीर राम के लिए काम करता है जैसे कुत्ता अपने मालिक के लिए काम करता है। राम का नाम मोती है जो कबीर के पास है। उसने राम की जंजीर को अपनी गर्दन से बांधा है और वह वहाँ जाता है जहाँ राम उसे ले जाता है।

काह भरोसा देह का, बिनस जात छान मारही। सांस सांस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाही।

अर्थ: इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह शरीर अगले पल होगा या नहीं। आपको हर पल भगवान को याद करना चाहिए।

सोना सज्जन साधू जन, टूट जुड़े सौ बार। दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एइके ढाका दरार।

अर्थ: अच्छे लोगों को फिर से अच्छा होने में समय नहीं लगेगा, भले ही उन्हें दूर करने के लिए कुछ किया जाए। वे सोने के जैसे हैं और सोना लचीला है और भंगुर नहीं है। लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार द्वारा बनाया गया मिट्टी का बर्तन जैसा होता है जो भंगुर होता है और एक बार टूट जाने पर वह हमेशा के लिए टूट जाता है।

कबीरा कलह अरु कल्पना, सैट संगती से जाय। दुःख बासे भगा फिरे, सुख में रही समाय।

अर्थ: यदि आप अच्छे लोगों के साथ जुड़ते हैं तो आप संघर्षों और आधारहीन कल्पनाओं का अंत कर सकते हैं। जो आपकी दुर्दशा का अंत करेगा और आपके जीवन को आनंदित करेगा।

जो रोऊ तो बल घटी, हंसो तो राम रिसाई। मनही माहि बिसूरना, ज्यूँ घुन काठी खाई।

अर्थ: अगर मैं रोता हूं, तो मेरा ऊर्जा स्तर नीचे चला जाता है। kabir ke doheअगर मुझे हंसी आती है तो राम को ऐसा नहीं लगता। किया करू अब? यह दुविधा मेरे दिल को दिमक की तरह खा जाती है।

पहुचेंगे तब कहेंगे, उमडेंगे उस ट्ठाई। अझू बेरा समंड मे, बोली बिगूचे काई।

अर्थ: जब मैं दूसरे किनारे पर पहुंचूंगा तो मैं इसके बारे में बात करूंगा। मैं अभी सागर के बीच में नौकायन कर रहा हूं। मरने का मरने के बाद देखना चाहिए, अभी जीवन जीने पे ध्यान देना चाहिए।

कबीर घोडा प्रेम का, चेतनी चढ़ी अवसार। ज्ञान खडग गहि काल सीरी, भली मचाई मार।

अर्थ: चेतना को प्रेम के घोड़े की सवारी करनी चाहिए। ज्ञान की तलवार मृत्यु का कारण बननी चाहिए।

मेरा मुझमे कुछ नही, जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझको सउपता, क्या लागई है मोर।

अर्थ: मेरा कुछ भी नहीं है मेरे पास जो कुछ भी है वह ईश्वर का है। अगर मैं उसे दे दूं जो उसका है, तो मुझे कुछ महान करने का कोई श्रेय नहीं है।

कबीर हरी रस यो पिया, बाकी रही ना थाकी। पाका कलस कुम्भार का, बहुरी ना चढाई चाकी।

अर्थ: कबीर ने भक्ति का रस चख लिया है, अब भक्ति के अलावा कोई स्वाद नहीं है। एक बार एक कुम्हार अपना बर्तन बनाता है और उसे पका लेता है, उस बर्तन को फिर से पहिया पर नहीं रखा जा सकता है।

Sant Kabir Das Ke Dohe In Hindi With Meaning

  • ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस। भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।
    • अर्थ: कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।
  • संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत, चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।
    • अर्थ: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
  • झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद। खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।
    • अर्थ: कबीर कहते हैं कि अरे जीव! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।
  • हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास। सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास।
    • अर्थ: यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।
  • जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं। जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
    • अर्थ: इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।
  • पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।
    • अर्थ: कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षण भंगुर है जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।
  • जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई। जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।
    • अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।
  • कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।
    • अर्थ: कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले।
  • कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन। कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।
    • अर्थ: कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।
  • कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई। बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।
    • अर्थ: कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।
  • हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।
    • अर्थ: कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।
  • माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख।
    • अर्थ: कबीर दास जी कहते कि माँगना मरने के समान है इसलिए कभी भी किसी से कुछ मत मांगो।
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Short Life Story Of Sant Kabeer Das Ji

तो दोस्तों, जैसे के हमने आपसे ऊपर वादा किया था. की हम आपको संत कबीर दास जी के जीवनी पर छोटा प्रकाश डालेंगे, तो शुरू करते हैं.

संत कबीर दास जी एक रहस्यवादी कवि के साथ साथ भारत के सबसे महान संतों में से एक थे, कबीर जी का जन्म वर्ष 1440 में हुआ था और 1518 में इनका देहांत हो गया था। इस्लाम धर्म के अनुसार कबीर का मतलब महान (great) होता है।

वैसे संत कबीर दस जी के माता-पिता के बारे में विश्वासपूर्वक किसी को नहीं पता है, लेकिन यह जरूर कहा जाता है कि संत कबीर जी मुस्लिम बुनकरों के बहुत गरीब परिवार में बड़े हुए थे। Kabir Ke Dohe वह बहुत ही आध्यात्मिक व्यक्ति थे और संत कबीर जी एक महान साधु थे।

उन्हें अपनी प्रभावशाली परंपराओं और संस्कृति के कारण दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली। kabir ke dohe कबीर पंथ एक विशाल धार्मिक समुदाय है, जो संत मत के संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में कबीर की पहचान करता है।

महान कवि, संत कबीर दास जी, भारतीय में अग्रणी आध्यात्मिक कवियों में से एक हैं । उन्होंने लोगों के जीवन को बढ़ावा देने के लिए अपने दार्शनिक विचार दिए थे। ये भी माना जाता है कि, उन्होंने बचपन में अपने गुरु रामानंद नाम के गुरु से आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

और बदलते समय के साथ वह गुरु रामानंद के जाने-माने शिष्य बन गए। kabir ke dohe भगवान और कर्म में एक वास्तविक धर्म के रूप में उनकी पवित्रता के दर्शन ने लोगों के मन को अच्छाई की ओर बदल दिया है। भगवान के प्रति उनका प्रेम और भक्ति मुस्लिम सूफी और हिंदू भक्ति दोनों की अवधारणा को पूरा करती है।

संत कबीर जी किस धर्म के थे? ये आज भी बहस का मुद्दा हैं, एक जाने मने इतिहासकार के अनुसार कबीर जी का जन्म एक गरीब मुस्लिम जोल्हे के घर में हुआ था। वहीं एक बड़े इतिहास के अनुसार संत कबीर जी के माता और पिता हिन्दू थे, जो धर्म परिवर्तन के बाद मुस्लिम बने थे।

और कुछ लोगो के द्वारा ये भी कहा जाता हैं की, संत कबीर दास जी मुसलमान थे. लेकिन कब वो रामानंद जी से मिले तो उनसे प्रभावित होकर हिन्दू धर्म को अपना लिए थे।

कबीर पंथ के सदस्यों को कबीर पंथियों के रूप में जाना जाता है, इन्होने पूरे उत्तर और मध्य भारत में विस्तार किया था। संत कबीर दास जी के कुछ महान लेखन कबीर ग्रंथावली, बीजक, सखी ग्रन्थि, kabir ke dohe, अनुराग सागर, इत्यादि हैं।

Sant Kabir Ke Dohe काफी प्रसिद्ध हैं. इसलिए हमने आपको ऊपर सबसे बेहतरीन Sant Kabir Ke Dohe with Hindi Meaning आपके लिए प्रस्तुत किये हैं. हमें पूर्ण विश्वास हैं आपको हमारा ये लेख अवश्य ही पसंद आया होगा। kabir ke dohe

Kabir Das Poems In Hindi

Que: कबीर दास का संदेश क्या है?

Ans: कबीर ने जोर देकर कहा कि भगवान को पाने का एकमात्र तरीका भक्ति के मार्ग से था। गहन प्रेम और भक्ति निश्चित रूप से एक परमपिता परमात्मा की प्राप्ति होगी।
उनके चरणों में कुल समर्पण एक व्यक्ति को उस तक पहुंचने में मदद करता है और यह सब का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए जो कबीर ने जोर दिया था।

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Que: कबीर दास किस धर्म के हैं?

Ans: कबीर दास भारत के एक महान संत थे। उनके लेखन ने भारत में सभी को प्रेरित किया। वह मुस्लिम, सिख और हिंदू समुदायों द्वारा सम्मानित हैं।
उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन एक मुस्लिम परिवार में बिताया। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें जोहलस युगल ने पाला था।

Que: कबीर ने किस भाषा में लिखा था?

Ans: ब्रज सहित विभिन्न बोलियों से उधार लेकर कबीर की कविताएं हिंदी में अलौकिक थीं। वे जीवन के विभिन्न पहलुओं को कवर करते हैं और भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति का आह्वान करते हैं।
Kabir Ke Dohe कबीर ने सरल हिंदी शब्दों के साथ अपने छंदों की रचना की। उनके अधिकांश कार्य भक्ति, रहस्यवाद और अनुशासन से संबंधित थे।

Que: हम कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe) कहाँ से पढ़ें?

Ans: आप इस पोस्ट में 309+ से ज्यादा कबीर के दोहे (Kabir Ke Dohe) बड़ी ही आसानी से पढ़ सकते हैं।

Last Word:

तो मेरे प्यारे दोस्तों, हमने इस पोस्ट में आपको कबीर के दोहे एवं उसके हिंदी में मीनिंग भी बताया हैं, हमें पूर्ण विश्वास हैं की आपको ये पूरा लेख पढ़ने के बाद आपको जरूर अच्छा महसूस कर रहे होंगे. अंत तक पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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